दो एक माइक चेक......
सुनो! आवाज आई!
उह्हू उह्हू
तो सुनो...
नेवलें सिर उठा रहे,
गिद्ध लोधड़े नोच रहे।
पीने को कुछ बाकी नहीं
खून तो पहले ही चूस चुके।
सुनो!अपनी पसंद के रंग का खून मिला क्या?
सुना है आजकल खून अलग अलग रंग का मिलने लगा है।
ओह्हो आपको पता नही है क्या?
हर रंग के मिलने की जगह अब अलग- अलग हो गई है।
अरे चेक करो फिर से,
हेलो! हेलो!
दो एक माइक चेक....
कुछ गायब है क्या?
नहीं वो हम गिद्ध नहीं है न,
इसलिए हमारी आवाज कभी- कभी दब जाती है।
अरे सुना है, वो रंगीन माइक वालों ने कल ही नए मांस का स्वाद चखा है।
पता चला कौन था,
हां वो मांस ही लबाबदार था,
खबर सब में फ़ैल गई।
कुछ टुकड़े सफेद कपड़े वाले इधर भी फेंक गए थे।
तो फिर तुमने उठाए नहीं!
नहीं- नहीं हमें आदत नहीं रंग देख के उठाने की।
वो पास वाले ने अपनी पसंद का रंग देख कर उठाकर, खा लिया था।
क्यूं वो भी गिद्ध था क्या?
नहीं यार, वो आस्तीन में छुपा सांप था।
तभी तो वो सफेद कपड़े वाला नेवला,
समझदारी से उधर ही फेंक गया था।
अच्छा ! अच्छा !
अरे! ये तो बताओ,
भाई सब ये बात कौन से जमाने की है।
अरे! बताया तो एक बार फिर से गौर करो।
हेलो! हेलो! दो एक माइक चेक।
~ राहुल कुमार
